“Dear Congress, तुम्हें भाजपा नहीं हरा रही… तुम्हें तुम्हारा ढीला अनुशासन और टूटता विश्वास हरा रहा है!”
“कांग्रेस, तुम्हें भाजपा नहीं हरा रही, तुम्हारा ढीला पड़ता अनुशासन और टूटता विश्वास हरा रहा है।”
प्रिय कांग्रेस, Indian National Congress
भारत के राजनीतिक परिदृश्य में अगर कोई नाम है जो एक विचार से बढ़कर एक भाव है, तो वह तुम हो। तुम सिर्फ़ एक पार्टी नहीं, बल्कि इस देश के लोकतांत्रिक अस्तित्व की पहली साँस हो। लेकिन आज जब मैं तुम्हें देखता हूँ, तो लगता है तुम अपने ही इतिहास के बोझ तले झुक गई हो, और शायद यही तुम्हारी सबसे बड़ी त्रासदी है।
भाजपा चुनाव लड़ती है तो लगता है कि कोई युद्ध लड़ रहा हो, योजना बनाकर, गणना करके, ज़मीन पर उतरकर। वो संगठन को ईश्वर की तरह पूजते हैं; और तुम, कांग्रेस, नेता को। वहाँ कार्यकर्ता सुबह से रात तक पार्टी का चेहरा बनता है, यहाँ कार्यकर्ता सिर्फ़ झंडा उठाने तक सीमित है , और नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस में सारा श्रेय ले जाता है। संगठन और पार्टी के बीच का यह फर्क ही तुम्हें कमजोर बना रहा है।
भाजपा में मुख्यमंत्री पर्ची से बनता है जो संगठन की कसौटी पर खरा उतरता है, चाहे उसके पास विधायक हों या न हों।
वो चुनाव जीतने के बाद भी रणनीति से शासन चलाते हैं लेकिन तुम्हारे यहाँ, चुनाव लड़ने वाला क्षेत्रीय नेता खुद ही पार्टी बन जाता है, और नतीजा यह कि जिसे संगठन का हिस्सा होना चाहिए, वही संगठन का केंद्र बन जाता है।
कांग्रेस, तुम्हारे कार्यकर्ताओं के पास जोश है, लेकिन दिशा नहीं। तुम्हारे पास लोग हैं, लेकिन नेतृत्व और दृष्टि में समन्वय नहीं। अकेले राहुल क्या करे? तुम्हारे पास इतिहास है, लेकिन वर्तमान से संवाद नहीं। और यही तीन कारण तुम्हें धीरे-धीरे उस स्थिति में ले जा रहे हैं जहाँ भावनाएँ हैं, पर परिणाम नहीं। भाजपा के कार्यकर्ता को पता है कि उसका काम क्या है, लेकिन तुम्हारे कार्यकर्ता को नहीं पता कि उसकी आवाज़ कौन सुनेगा।
वो बूथ तक मेहनत करता है, गाँव-गाँव जाता है, लेकिन ऊपर से कोई निर्देश नहीं आता। नीचे जोश है, ऊपर सन्नाटा। और यही सन्नाटा संगठन की सबसे बड़ी दुश्मन बन गया है। कांग्रेस, बदलाव तुम्हारे लिए मुश्किल नहीं है , बस तुम्हें तय करना होगा कि क्या तुम फिर से एक विचार बनना चाहती हो, या सिर्फ़ एक पार्टी रह जाना चाहती हो। तुम्हें यह समझना होगा कि आज की राजनीति सिर्फ़ नैरेटिव से नहीं, संगठन से चलती है।
तुम्हारे पास अब भी लाखों कार्यकर्ता हैं जो गांधी की सादगी, नेहरू की दूरदर्शिता और इंदिरा की दृढ़ता में विश्वास करते हैं।
लेकिन उन्हें दिशा चाहिए, पहचान नहीं। कांग्रेस, तुम्हारे लिए अब वक्त आ गया है कि तुम आत्ममंथन नहीं, आत्मपुनर्निर्माण करो। फिर से जमीनी बनो, फिर से बूथ लेवल से उठो, फिर से जनता से सीधे संवाद करो – क्योंकि लोकतंत्र में वही पार्टी टिकती है जो जनता की नब्ज़ सुनती है, ना कि जो सोशल मीडिया पर ट्रेंड बनाने में विश्वास रखती है।
आज के भारत को उस कांग्रेस की ज़रूरत नहीं जो सिर्फ़ अपने अतीत पर गर्व करे, बल्कि उस कांग्रेस की ज़रूरत है जो भविष्य को दिशा दे सके। अगर तुमने अपने कार्यकर्ताओं का सही इस्तेमाल शुरू किया, तो वही हाथ फिर उठेगा जो कभी देश को आज़ाद कराने उठा था। वरना इतिहास के पन्नों में तुम्हारा नाम तो रहेगा, लेकिन वर्तमान में नहीं।
नीरज शर्मा
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