“चुप्पी का बोझ”

“चुप्पी का बोझ”

newstaranaad
5 Min Read

 स्टोरी: “चुप्पी का बोझ”

(Newstarana.com)

अजय और संध्या की शादी को आठ साल हो चुके थे। शुरूआती दिन बहुत खूबसूरत थे। देर रात तक बातें करना, छोटे-छोटे सरप्राइज़, और हर सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ।

लेकिन वक्त के साथ हालात बदलने लगे।

अजय दफ्तर की जिम्मेदारियों में उलझ गया। संध्या घर और बच्चों के बीच थक जाती।

धीरे-धीरे बातचीत कम होने लगी। अब घर में अक्सर खामोशी रहती। संध्या सोचती – “उसे अब मेरी परवाह नहीं।”अजय मन ही मन कहता – “वो सिर्फ शिकायत करती है।”

एक दिन का मोड़ एक शाम संध्या ने चुपचाप खाना टेबल पर रखा और कमरे में जाकर दरवाज़ा बंद कर लिया।

अजय ने कुछ नहीं कहा। रात देर तक मोबाइल पर स्क्रॉल करते हुए अजय को अचानक अलमारी में रखी शादी की फोटो दिख गई।

उस तस्वीर में दोनों मुस्कुरा रहे थे – जैसे दुनिया की सबसे खुश जोड़ी हों। अजय की आँखें भर आईं।

वो सोचने लगा – “क्या वाकई अब हम अजनबी हो गए हैं? भावनाओं का विस्फोट

अगली सुबह संध्या बच्चों को स्कूल छोड़ने गई थी।

रास्ते में उसकी सहेली रीमा मिली। उसने कहा – “तू ठीक तो है? चेहरा बहुत बुझा-बुझा लग रहा है।”

बस यही सुनकर संध्या की आँखों से आँसू बह निकले।

उसने पहली बार किसी को बताया – “रीमा, मुझे लगता है अजय को अब मेरी ज़रूरत नहीं। हम बस नाम के रिश्ते में रह गए हैं।”

रीमा ने हल्के से उसका हाथ पकड़कर कहा –

“अगर तू चाहे तो एक जगह ले चलूँ। वहाँ अनिल पारीक जी हैं, योग ट्रेनर और NLP प्रैक्टिशनर है । शायद वो मदद कर पाएँ।”

मुलाक़ात NLP प्रैक्टिशनर अनिल पारीक जी से

रीमा उसी शाम अजय और संध्या को लेकर अनिल पारीक जी के पास पहुंची

अनिल जी ने ध्यान से दोनों की बातें सुनीं।

फिर शांत स्वर में बोले –

“रिश्ते अक्सर तकरार से नहीं, चुप्पी से टूटते हैं।

आप दोनों में गुस्सा नहीं है, दर्द है। पर आपने उस दर्द को शब्द नहीं दिए।

जब भावनाएँ बोली नहीं जातीं, तो वे दीवारें बन जाती हैं।”

अजय ने झिझकते हुए कहा –

“पर क्या करूँ? कई बार कह नहीं पाता… डर लगता है कि और नाराज़ न हो जाए।”

संध्या ने भी रोते हुए कहा –

“मैं भी यही सोचती हूँ… जताना कमजोरी लगती है।

NLP का अभ्यास

अनिल जी मुस्कुराए और बोले –

“आइए, आज एक छोटा अभ्यास करते हैं। बस एक-दूसरे को सुनिए… बिना टोके, बिना जज किए।”

संध्या बोली –

“मुझे लगता है तुम मुझसे दूर हो गए हो। मुझे तुम्हारी ज़रूरत है, पर तुम चुप रहते हो।”

अजय ने गहरी साँस ली और कहा –

“मुझे लगता है तुम हर समय नाराज़ रहती हो। लेकिन सच ये है कि मैं अंदर से बहुत थक गया हूँ, पर दिखा नहीं पाता।”

यह सुनकर संध्या फूट-फूट कर रो पड़ी।

अजय ने पहली बार उसकी आँखों में देखा और महसूस किया – वो आज भी वही लड़की है जिससे उसने प्यार किया था।

उस पल अनिल जी ने दोनों से कहा –

“सोचिए, अगर आज आप दोनों यहाँ न आते? तो शायद यही चुप्पी धीरे-धीरे रिश्ते को खत्म कर देती।”

अजय और संध्या दोनों सिहर उठे।

उन्हें लगा जैसे उनकी आँखों के सामने एक सच खुल गया हो।

योग गुरु अनिल जी ने अंत में कहा –

“रिश्ते टूटते नहीं, हम उन्हें बचाना छोड़ देते हैं।

संवाद कोई बहस नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने वाला सेतु है।

आज से आप दोनों रोज़ सिर्फ पाँच मिनट दिल से एक-दूसरे को सुनेंगे। बस सुनना है… और कुछ नहीं।”

अजय और संध्या ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया।

उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वो आँसू दर्द

के नहीं, उम्मीद के थे।

और इस तरह, चुप्पी का बोझ संवाद की रोशनी में धीरे-धीरे पिघलने लगा।

Newstarana.com

Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!