“Changing China : राख विसर्जन की जगह अब अस्थि संभालने की परंपरा — बदलती सोच और पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक”

"Changing China: राख विसर्जन की जगह अब अस्थि संभालने की परंपरा — बदलती सोच और पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक"

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“Changing China: राख विसर्जन की जगह अब अस्थि संभालने की परंपरा — बदलती सोच और पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक”

भारत जैसे आध्यात्मिक देश में जहाँ सदियों से परंपराएं धार्मिक आस्थाओं से गहराई से जुड़ी रही हैं, वहीं अब आधुनिकता और पर्यावरणीय चेतना के चलते कई पुरानी रीतियों में बदलाव देखने को मिल रहा है। ऐसा ही एक उल्लेखनीय परिवर्तन अंतिम संस्कार से जुड़ी परंपरा में देखा जा रहा है—जहाँ लोग अब राख (अस्थियाँ) जलाशयों या नदियों में विसर्जित करने की बजाय उन्हें सुरक्षित रख रहे हैं। The Economic Times की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले छह वर्षों में राख विसर्जन की परंपरा में 6.7% की कमी आई है, जो समाज में हो रहे एक गहरे मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक परिवर्तन का संकेत देती है।

 

यह बदलाव केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि आर्थिक, पर्यावरणीय और भावनात्मक पहलुओं से भी जुड़ा हुआ है। पहले जहाँ परिवार जन गंगा, यमुना या नर्मदा जैसी पवित्र नदियों तक अस्थि विसर्जन के लिए लंबी यात्रा करते थे, अब बहुत से लोग अपने प्रियजनों की अस्थियों को सुंदर कलशों में, घर के पूजा स्थल या किसी स्मृति स्थल पर सुरक्षित रख रहे हैं। अस्थियाँ रखने की यह प्रथा अब धीरे-धीरे शहरों और गांवों दोनों में स्वीकार्य होती जा रही है।

 

रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 में देश में राख विसर्जन का प्रतिशत 67% था, जो 2025 तक घटकर लगभग 60.3% तक पहुंच गया है। इसका एक प्रमुख कारण लोगों की बढ़ती पर्यावरणीय जागरूकता है। गंगा और अन्य नदियों के प्रदूषण को लेकर सरकारों और सामाजिक संगठनों ने कई बार चिंता व्यक्त की है। राख या अस्थियाँ, भले ही धार्मिक दृष्टि से पवित्र मानी जाती हों, लेकिन इनमें मौजूद रासायनिक तत्व जल की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। इस वजह से कई परिवार अब पर्यावरण की रक्षा के उद्देश्य से वैकल्पिक उपाय अपना रहे हैं।

 

इसके अतिरिक्त, आज के शहरी जीवन में लोगों की जीवनशैली भी तेजी से बदल रही है। पहले संयुक्त परिवारों में जहाँ सभी सदस्य एकत्र होकर अंतिम संस्कार और विसर्जन की प्रक्रिया को एक पारिवारिक जिम्मेदारी के रूप में निभाते थे, अब एकल परिवार और व्यस्त जीवनशैली के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे व्यावहारिक रूप से कठिन होती जा रही है। कई लोग अपने परिजनों की अस्थियाँ मंदिरों, धार्मिक ट्रस्टों या विशेष स्मृति उद्यानों (Memory Parks) में सुरक्षित रखने लगे हैं। इन स्थानों पर धार्मिक कर्मकांड भी समय-समय पर आयोजित किए जाते हैं ताकि श्रद्धांजलि देने का अवसर बना रहे।

 

अस्थियों को रखने के लिए आधुनिक तकनीक और उद्योग जगत ने भी नए विकल्प तैयार किए हैं। आज बाजार में ऐसे “इको-फ्रेंडली अस्थि कलश” और “डिजिटल मेमोरियल बॉक्स” उपलब्ध हैं, जिनमें QR कोड के माध्यम से मृतक की तस्वीरें, जीवन की झलकियाँ और श्रद्धांजलि संदेश सहेजे जा सकते हैं। यह न केवल भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखने का तरीका है, बल्कि यह परंपरा और तकनीक के अद्भुत संगम का उदाहरण भी है।

 

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि अस्थियों को संभालने की यह प्रवृत्ति अब महंगी भी होती जा रही है। एक सामान्य कलश की कीमत 20,000 रुपये तक पहुँच चुकी है, जबकि विशेष डिज़ाइन वाले या मंदिर में स्थापित करने योग्य स्मृति कलशों की कीमत 25 लाख रुपये तक जाती है। बड़ी संख्या में लोग अपने प्रियजनों की स्मृति को जीवित रखने के लिए इस पर खर्च करने को तैयार हैं, क्योंकि यह उनके लिए “आध्यात्मिक संपत्ति” बन चुकी है।

 

धार्मिक विद्वानों की राय भी इस पर विभाजित है। कुछ पंडित और संत मानते हैं कि जल में विसर्जन से आत्मा को मुक्ति मिलती है, जो शास्त्रों में वर्णित है। वहीं दूसरी ओर, कुछ आधुनिक धार्मिक संस्थान यह मानते हैं कि श्रद्धा का स्वरूप बदल सकता है, लेकिन भावना और सम्मान वही रहना चाहिए। वे इसे “संस्कार का नया आयाम” कहते हैं, जहाँ श्रद्धा और पर्यावरण संरक्षण एक साथ चल सकते हैं।

 

सरकारी स्तर पर भी यह मुद्दा ध्यान आकर्षित कर रहा है। कई राज्य सरकारें अब नदियों के प्रदूषण को रोकने के लिए अस्थि विसर्जन के लिए निर्धारित घाटों पर “इको टैंक” और “अस्थि संग्रहण केंद्र” बना रही हैं। साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर “ऑनलाइन अस्थि विसर्जन सेवा” जैसी सुविधाएँ शुरू की गई हैं, जिनके माध्यम से लोग दूर से ही श्रद्धांजलि दे सकते हैं।

 

समाजशास्त्रियों के अनुसार, यह परिवर्तन केवल धार्मिक व्यवहार में नहीं बल्कि सोच और संवेदनाओं में भी एक नई दिशा का प्रतीक है। पहले लोग मृत्यु को अंत मानते थे, जबकि अब स्मृति को जीवन का विस्तार समझा जाने लगा है। परिवारजन मृतक की अस्थियों को सुरक्षित रखकर उस व्यक्ति की उपस्थिति को अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखना चाहते हैं। यह एक प्रकार का “भावनात्मक स्थायित्व” (Emotional Continuity) है, जो आधुनिक समाज में लोगों की बदलती मनोवृत्ति को दर्शाता है।

 

पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि यह प्रवृत्ति और बढ़ती है, तो इससे नदियों की स्वच्छता में निश्चित रूप से सुधार होगा। हर साल भारत में लाखों टन अस्थियाँ और पूजा सामग्री नदियों में प्रवाहित की जाती हैं, जिससे पानी की गुणवत्ता और जलीय जीवन दोनों प्रभावित होते हैं। यदि लोगों में यह जागरूकता बनी रहती है, तो गंगा और अन्य नदियों को “अस्थि-मुक्त” रखने की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा।

 

अंततः यह कहा जा सकता है कि राख विसर्जन की पारंपरिक परंपरा में यह बदलाव किसी धार्मिक विचलन का नहीं, बल्कि समाज की परिपक्वता और चेतना का संकेत है। श्रद्धा अब केवल अनुष्ठानिक न होकर भावनात्मक और जिम्मेदार बनती जा रही है। राख को सुरक्षित रखना, स्मृति को संजोना और पर्यावरण की रक्षा करना—ये तीनों मिलकर आज के भारत की नई सांस्कृतिक पहचान बना रहे हैं। आने वाले वर्षों में यह प्रवृत्ति और सशक्त रूप लेगी, जहाँ धर्म, विज्ञान और पर्यावरण सभी एक साझा दिशा में आगे बढ़ेंगे।

 

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