“Go-Green Tradition of Rajasthan: कोटा में गोबर से बना गोवर्धन, पर्यावरण और आस्था का मिलन”
हमारा विषय है गाँव-शहर के उस सरल मगर गहरे अर्थ वाले आयोजन का, जिसमें गोबर अर्थात् गौ के उपजनित गोवर (गौमूत्र-गोबर) को सामूहिक रूप से एक प्रकार से “गोवर्धन” रूप में ढाला जाता है और पूजा-आराधना की जाती है। आज हम विशेष रूप से कोटा क्षेत्र में होने वाली उस क्रिया का अवलोकन कर रहे हैं, जहाँ “125 किग्रा गोबर से 8 घंटे में गोवर्धन” बनाने की प्रक्रिया समानांतर चलती है। यह सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, पशु-पालन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक एकता का प्रतिबिंब है।
गोबर से गोवर्धन क्यों?
गोबर, यानी गौ के उपजाए गए गोमल, गोबर के गोले, गोबर-पपड़ी आदि—इनका प्रयोग पुरातन काल से भारत में अनेक प्रकार से हुआ है: इमारती सामग्री, रक्षा की पद्धति, कृषि-उर्वरक, पूजा-सामग्री आदि। राजस्थान जैसे पशुपालक-कृषि प्रधान क्षेत्र में यह और भी महत्वपूर्ण है।
वहीं गोवर्धन पूजा का एक पुराना mythological प्रतीक है: गोवर्धन पर्वत (ब्रज क्षेत्र में) को भगवान कृष्ण ने उठाया था—और उसी के नाम पर यह पर्व मनाया जाता है।
राजस्थान और विशेषकर ग्रामीण-स्थल में इस पर्व का रूप स्थानीय स्थिति के अनुरूप विकसित हुआ है—गोबर से आकृतियाँ बनाना, गाय-पशुओं की पूजा करना, घर-द्वार को सजाना आदि।
इसलिए जब कोटा में 125 किग्रा गोबर से आठ घंटे में “गोवर्धन” बनता है, तो वह सिर्फ आकार नहीं बल्कि अर्थ-बोध का प्रतीक बन जाता है: गोवर-धन, पशु-धन, कृषि-धन, सामूहिक-धन।
कोटा में प्रक्रिया का स्वरूप तैयारी
सबसे पहले उक्त 125 किग्रा गोबर (ताजा या कुछ समय से सींचा-सुका) एकत्र किया जाता है। यह गाय-गोशाला, ग्रामीण घर, या अन्य स्रोतों से आता है।
गोबर को अच्छी तरह गूंथा जाता है—पानी मिलाया जाता है, मिश्रण को ठोस रूप दिया जाता है ताकि वह आकृति बनाने लायक हो।
स्थानीय महिलाएँ-पुरुष मिलकर उपकरण तैयार करते हैं—लकड़ी, पांवटा, बेलचा, गमल-पात्र आदि।
पूजा-स्थिति तय की जाती है—स्थान, रंग-पोलिका (रंगों से सजावट), ग्यारिया, फूल-फूलों से बिछाव आदि।
आकृति निर्माण
आठ घंटे का समय तय होता है। शुरुआत सुबह या पूजा के पहले समय में होती है।गोबर को कई स्थर-परतों में लगाकर आकार दिया जाता है, अक्सर गोवर्धन पर्वत का रूप लेते हुए—गोलाकार, ऊँचा, सजावटी प्रतीक।
आकृति के चारों ओर गाय-बछड़े-पलाल आदि छोटे-छोटे गोबर-मॉडल बनाये जा सकते हैं। महिला-पुरुष मिलकर इसे हाथों से तराशते हैं।
कुछ स्थानों पर रंग-चक्र, फूलों की गारलें, हल्दी-कुमकुम से सजावट भी की जाती है।
पूजा-आराधना
आकृति पूरी होने के बाद उस पर दीप, धूप, पुष्प चढ़ाए जाते हैं। गाय-पशुओं को सजाया जाता है।
स्थानीय भक्ति-गीत गाये जाते हैं, भजन होते हैं, सामूहिक रूप से भोज होता है।
उसके बाद गोवर्धन पूजा के अंतर्गत उस आकृति को कुछ समय बाद खेतों में/गोशाला में भेजा जाता है—गोबर-मॉडल “वापस भूमि को” लौट जाता है, अर्थात् वृत्ताकार अर्थ-चक्र पूरा होता है।
सामाजिक-सांस्कृतिक आयाम
इस 8 घंटे की क्रिया में गाँव-शहर की एकता झलकती है—पुरुष-महिला मिलकर काम करते हैं।
बच्चों को-साथ लिया जाता है, गोबर-मिश्रण बनाना, मॉडल तौल-तैयारी में शामिल होते हैं—एक सामाजिक शिक्षा-मंच बन जाता है।
उक्त आयोजन के माध्यम से लोकधर्म, लोककलाएँ और स्थानीय संस्कृति-ज्ञान आगे बढ़ता है।
अर्थ एवं प्रतीक-स्तर
पर्यावरणीय अर्थ
गोबर का उपयोग—यह वेस्ट नहीं बल्कि संसाधन है। कृषि में यह उर्वरक के रूप में काम आता है, पशु-मलोत्सर्ग से भूमि की उर्वरता बढ़ती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में यह एक अहम अंग है। वेस्ट को वैल्यू में बदलने की यह प्रक्रिया पर्यावरण-संज्ञा भी देती है।
जब 125 किग्रा गोबर आठ घंटे में एक मॉडल बन जाता है, तो यह दिखाता है कि कैसे स्थानीय संसाधन (गोबर) को अर्थपूर्ण तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है।
धार्मिक-आध्यात्मिक अर्थ
गोवर्धन पर्वत की कथा—कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की घटना—प्रकृति, पशु-पालन, कृषि और मानव-सम्बंध को एक सूत्र में बांधती है। इस कथा द्वारा यह संदेश मिलता है कि प्रकृति (पर्वत), पशु-पालन (गाय-गोबर), कृषि (घास-भोजन, भू-उपज) तथा मानव-जीवन परस्पर निर्भर हैं।
गोबर-मॉडल तैयार करना, उसकी पूजा करना, पशुओं को सम्मान देना—all यह सक्रिय रूप से उस आदर्श को जीवंत करता है।
सामाजिक-आर्थिक अर्थ
ग्राम-समाज में गाय-पालन एक मुख्य व्यवसाय है। गोबर-उपज से अतिरिक्त लाभ मिलता है—गोबर-उर्वरक, ईंधन (घटिया किस्म के गोबर-ब्रिक) आदि।
इस आयोजन में सामुदायिक भागीदारी बढ़ती है—समय-सेट, प्रयोजन, संसाधन mobilisation। यह सामाजिक पूंजी को बढ़ाता है।
यह आयोजन ग्रामीण-युवा, बच्चों को स्थानीय परंपरा से जोड़ता है—उन्हें यह अनुभव होता है कि घरेलू संसाधन, पशु-धन, गोबर-धन आदि कितने मूल्यवान हैं।
यदि इस तरह के आयोजनों में कुछ व्यापारिक रूप आता है (उदाहरण-स्वरूप गोबर-ब्रिक बनाना, गोबर-मॉडल-सजावट आदि) तो यह ग्रामीण स्वरोजगार के स्रोत बन सकते हैं।
सामुदायिक एकता एवं सांस्कृतिक समरसता
8 घंटे निरंतर मिलकर काम करना — यह समय-सीमा, अनुशासन, सहयोग की भावना को बढ़ावा देती है।
पूजा-भोजन-संबद्धism का हिस्सा बनने से सामाजिक बंधुत्व बढ़ता है।
गोबर-मॉडल की तैयारी में पुरुष-महिला, बुजुर्ग-युवा मिलते हैं; इससे सामाजिक अन्तर-पीढ़ी संपर्क बढ़ता है।
यह आयोजन लोक-परंपरा को निर्माण-स्थल पर जीवित रखने में सहायक है—गाय-पूजा, गोबर-उपयोग, सामूहिक भजन-कथाएँ, लोकगीत-कहानियाँ।
चुनौतियाँ एवं सुझाव
चुनौतियाँ
गोबर के स्रोत सुनिश्चित करना: 125 किग्रा पर्याप्त मात्रा सुनिश्चित करना, समय पर एकत्र करना कठिन हो सकता है।
मौसम-स्थिति, स्थान की व्यवस्था, सुरक्षा-सज्जा आदि में व्यवधान आ सकता है।
युवा वर्ग में पारंपरिक गतिविधियों के प्रति उत्साह कम हो रहा है।
यदि आयोजन में पर्यावरण-दृष्टि से अनुकूल सामग्री न हो, तो सजावट-उपकरण में प्लास्टिक आदि उपयोग हो सकता है, जो आयोजन के “प्रकृति-भाव” को कमजोर कर सकता है।
सुझाव
आयोजन से पहले गोशालाओं और ग्रामीण किसानों से समन्वय करें ताकि गोबर समय पर उपलब्ध हो सके।
स्थानीय विद्यालय-महिला-संगठनों को भागीदारी के लिए प्रेरित करें; तकनीकी-सहायता (उदाहरण-स्वरूप मॉडल-डिजाइन, सजावट-विधि) दें।
सजावट में प्राकृतिक रंग-पिगमेंट, फूल-पत्ते-पत्ता-माला का उपयोग करें ताकि पर्यावरण-अनुकूलता बनी रहे।
आयोजन के बाद गोबर-मॉडल को खेतों में उर्वरक रूप में वापस लौटाएँ—इससे “उपयोग → पुनरावलोकन → पुनरुत्पादन” चक्र पूर्ण होगा। यह गाँव-खेत-पशु-मानव के बीच चक्र को दिखाता है।
आयोजन का श्रुतलेख (फोटो, वीडियो) तैयार करें तथा सोशल-मीडिया आदि पर साझा करें—इससे स्थानीय-परंपरा का प्रचार होगा और आगे आने वाली पीढ़ियों में रुचि बढ़ेगी।
बच्चों-युवाओं के लिए कथा-वाचन-प्रदर्शन का आयोजन करें—कृष्ण-गोवर्धन-कथा, गाय-पालन-गौधन-महत्व आदि पर। इससे सहभागिता बढ़ेगी।
निष्कर्ष
कोटा-क्षेत्र में “125 किग्रा गोबर से 8 घंटे में गोवर्धन” की यह क्रिया सिर्फ एक लोक-पर्व नहीं, बल्कि ग्रामीण-संसाधन, प्राकृतिक-चक्र, धार्मिक-भावना, सामाजिक-एकता, आर्थिक-सहायता, पर्यावरण-संज्ञा—सभी को समाहित करती है।
जब हम गोबर को ‘वेस्ट’ न समझकर ‘धन’ मानते हैं—जैसा कि लेखी-अनुभव बताते हैं (“गोबर-धन” = गोवर-धन) —तो हम वास्तव में भूमि-पशु-मानव के मध्य उस संतुलन की ओर झुकते हैं, जिसे हमारी पुरानी संस्कृतियाँ जानती थीं।
यह पर्व बच्चों-युवाओं को स्थानीय संसाधनों, स्थानीय परंपराओं, प्राकृतिक-चक्रों के प्रति जागरूक करता है। यह दिखाता है कि कैसे एक सामुदायिक क्रिया केवल उत्सव नहीं बन सकती, बल्कि सामाजिक अर्थ-निर्माण, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और आर्थिक-सहायता का माध्यम भी बन सकती है।
अंत में यही कहना चाहूँगा कि इस प्रकार का आयोजन यदि निरंतर और सतत रूप से हो, तो आने वाली पीढ़ियाँ सिर्फ उत्सव नहीं देखेंगी—बल्कि अनुभव करेंगी कि “धन” सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि प्राकृतिक-संचय, पशु-पालन, सहकार्य और संस्कृति-संवर्द्धन भी हो सकती है।



