बिहार चुनाव के छः महीना पहले राहुल गाँधी की लोकप्रियता अपने चरमोत्कर्ष पर थी।
मैंने खुद एक इंटरनल सर्वे करवाया था, जिसमे बिहार की लगभग ८० प्रतिशत जनता कांग्रेस की नीतियों से बेहद प्रभावित थी और राहुल के लिए मरने- मारने को भी तैयार थी।
ऐसे हालात हो गए थे कि नीतीश और मोदी का कोई नाम भी सुनने को तैयार नहीं था। लोग नाम सुनते ही गाली देने लगते थे।
मैंने कितने ही लोगों को देखा जिन्होंने अपने सीने पर राहुल गाँधी का नाम गुदवा रखा था। लोकप्रियता का ऐसा आलम आज़ादी के बाद किसी भी नेता के लिए नहीं देखने को मिला था।
हमारे इंटरनल सर्वे के अनुसार कांग्रेस के ८० प्रतिशत के बाद जो २० प्रतिशत जनता बची हुई थी, वह बिहार के एकमात्र विकास पुरुष श्री लालू यादव के साथ थी। उसके बाद तेजस्वी का जो जलवा था, वह अलग ही था।
चूँकि कांग्रेस और राजद पुराने गठबंधन के साथी थे, इसलिए कांग्रेस ने बड़ा दिल दिखाते हुए गठबंधन धर्म निभाया और उसे १४३ सीटें दी और खुद ६० सीटों पर ही चुनाव लड़ी। उसने अपने हिस्से से ही २५ सीटें vip और १५ सीटें कम्युनिस्टों को भी दे दिया।
राजनीति में त्याग और सदाशयता का इससे उत्कृष्ट उदाहरण नहीं देखने को मिलता।
कांग्रेस अगर चाहती तो अकेले चुनाव लड़कर भी २४३ में से लगभग २३५ सीटें जीत सकती थी।
उसके बाद डरी हुई केंद्र सरकार ने खेल शुरू किया और एस आई आर के जरिए लगभग आठ करोड़ वोटरों को हटाकर नये वोटर जुड़वा दिये। खुद दिल्ली से दो करोड़ लोग वोट डालने गए थे।
बाकी काम evm ने कर दिया।
अंदरूनी सूत्रों के अनुसार अमित शाह विपक्ष को एक भी सीट देने को राजी नहीं थे, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हाथ- पैर जोड़ने लगे कि मालिक दस-बीस सीट विपक्ष को भी दे दो, नहीं तो उनको शक हो जायेगा।
राकेश मिश्र ‘सरयूपारीण’
just a joke…….
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