लाल आतंक के खात्मे की तैयारी, तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को सामूहिक आत्मसमर्पण की अपील। Newstarana.com

Yogita Mehra
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लाल आतंक के खात्मे की तैयारी, तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को सामूहिक आत्मसमर्पण की अपील।

लाल आतंक का अंत? तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को नक्सलियों का सामूहिक आत्मसमर्पण अपील पत्र

​24 नवंबर, 2025

​रायपुर/नागपुर/भोपाल: देश में वामपंथी उग्रवाद (Left-Wing Extremism) के खिलाफ चलाए जा रहे निर्णायक अभियान के बीच एक ऐतिहासिक और अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ स्पेशल जोनल कमेटी (MMC Zone), ने तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखकर सामूहिक आत्मसमर्पण (Mass Surrender) की इच्छा जताई है। यह अपील भारत को 31 मार्च, 2026 तक नक्सल मुक्त करने के केंद्र सरकार के संकल्प को एक बड़ी सफलता और ‘लाल आतंक’ के लगभग अंतिम चरण का संकेत देती है।

​आत्मसमर्पण की अपील: पत्र में क्या लिखा है?

​एमएमसी जोन के नक्सलियों द्वारा संयुक्त रूप से जारी किए गए इस पत्र को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को संबोधित किया गया है। पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि एमएमसी जोन के सभी सदस्य एक साथ मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं।

​नक्सलियों ने आत्मसमर्पण के लिए कुछ शर्तें और मोहलत की मांग की है। उन्होंने अपनी मांगें रखते हुए कहा है कि वे नक्सली विचारधारा को छोड़कर आत्मसमर्पण करने वाले अपने दो वरिष्ठ साथियों—महाराष्ट्र में आत्मसमर्पण करने वाले भूपति (सोनू दादा) और छत्तीसगढ़ में सरेंडर करने वाले सतीश (रूपेश)—के नक्शेकदम पर चलना चाहते हैं।

​पत्र की मुख्य मांगें और घोषणाएं इस प्रकार हैं:

​वार्ता की मोहलत और युद्धविराम: नक्सलियों ने सुरक्षा बलों के साथ बातचीत और आत्मसमर्पण की प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए 15 फरवरी, 2026 तक की मोहलत मांगी है। उन्होंने अनुरोध किया है कि इस अवधि तक तीनों राज्यों में सुरक्षा बलों द्वारा कोई भी बड़ा ऑपरेशन न चलाया जाए, ताकि आत्मसमर्पण की प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हो सके।

​पीएलजीए सप्ताह का स्थगन: एक और महत्वपूर्ण घोषणा में नक्सलियों ने भरोसा दिलाया है कि वे अपना सालाना ‘पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी वीक’ (PLGA Week), जो आमतौर पर दिसंबर में मनाया जाता है, इस वर्ष नहीं मनाएंगे। यह कदम सुरक्षा बलों को ऑपरेशन न चलाने की अपील को और बल देता है।

​सूचना नेटवर्क बंद करने की गुहार: नक्सलियों ने तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों से अपील की है कि कुछ समय के लिए सूचना और समाचार नेटवर्क को बंद कर दिया जाए, ताकि आत्मसमर्पण की प्रक्रिया को अंदरूनी तौर पर व्यवस्थित किया जा सके और किसी भी बाहरी हस्तक्षेप या मीडिया कवरेज से बचा जा सके।

​मास सरेंडर की तारीख की घोषणा: पत्र में यह भी कहा गया है कि वे जल्द ही एक और पत्र भेजकर सामूहिक आत्मसमर्पण की अंतिम तारीख और स्थान की घोषणा करेंगे।

​सुरक्षाबलों का दबाव और नेतृत्व का टूटना

​यह अभूतपूर्व अपील अचानक नहीं आई है। पिछले कुछ महीनों में नक्सली आंदोलन को एक के बाद एक कई बड़े झटके लगे हैं, जिसने उनके मनोबल को तोड़ दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार सार्वजनिक रूप से यह संकल्प दोहराया है कि भारत को 31 मार्च, 2026 तक नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाएगा। सुरक्षा बलों ने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अपनी रणनीति में आक्रामकता और विकास के मॉडल को सफलतापूर्वक मिलाया है।

​प्रमुख कारण जिन्होंने आत्मसमर्पण की लहर को प्रेरित किया:

​प्रमुख नेताओं का सफाया: सूत्रों के अनुसार, कुख्यात नक्सली नेता हिडमा के खात्मे की खबर ने संगठन के भीतर खौफ पैदा कर दिया है। हिडमा की मौत (या निष्क्रियता) ने माओवादियों के सैन्य विंग को लगभग नेतृत्वहीन कर दिया है।

​रिकॉर्ड तोड़ आत्मसमर्पण: हाल के महीनों में दो सबसे बड़े और प्रभावशाली आत्मसमर्पण हुए हैं। पहले, दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (DKSZC) के सदस्य और केंद्रीय कमेटी के पूर्व सदस्य भूपति (सोनू दादा) ने 60 से अधिक साथियों के साथ महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में सरेंडर किया। इसके बाद, केंद्रीय कमेटी के एक और सदस्य रूपेश (सतीश) ने छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में 200 से अधिक कैडरों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। इन दोनों घटनाओं ने बाकी कैडरों को मुख्यधारा में लौटने के लिए एक स्पष्ट रास्ता दिखाया।

​विकास और पुनर्वास नीति: केंद्र और राज्य सरकारों की पुनर्वास नीति-2025 (Naxal Eradication and Rehabilitation Policy-2025) की सफलता भी आत्मसमर्पण की प्रमुख वजह बनी है। इस नीति के तहत, आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को आर्थिक सहायता, व्यावसायिक प्रशिक्षण और मुख्यधारा में सम्मानजनक जीवन जीने के अवसर दिए जा रहे हैं।

​सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एमएमसी जोन का यह फैसला सुरक्षाबलों द्वारा जंगलों के भीतर फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (FOBs) स्थापित करने, खुफिया नेटवर्क को मजबूत करने और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों को तेजी से लागू करने की रणनीति की सफलता का प्रमाण है।

​केंद्रीय नेतृत्व में दरार: यह ‘केंद्रीय कमेटी’ का निर्णय नहीं

​हालांकि, हेडलाइन में ‘नक्सलियों की केंद्रीय कमेटी’ (Naxalites’ Central Committee) द्वारा अपील की बात कही गई है, लेकिन यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की शीर्ष केंद्रीय समिति (CC) ने सामूहिक आत्मसमर्पण की इस लहर को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।

​केंद्रीय समिति के प्रवक्ता ‘अभय’ द्वारा जारी प्रेस नोट में स्पष्ट किया गया है कि भूपति और रूपेश जैसे नेताओं का आत्मसमर्पण ‘राजनीतिक विचलन’ और ‘क्रांति के साथ विश्वासघात’ है। केंद्रीय कमेटी ने इन आत्मसमर्पण करने वाले नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया है और अपने बचे हुए कैडरों से अपील की है कि वे ‘क्रांतिकारी न्याय’ के अनुसार इन ‘देशद्रोहियों’ को दंडित करें।

​यह विरोधाभास दर्शाता है कि नक्सल आंदोलन अपने आंतरिक संघर्ष के चरम पर है। शीर्ष नेतृत्व वैचारिक रूप से हथियार छोड़ने को तैयार नहीं है, जबकि क्षेत्रीय कमांड और जमीनी कैडर सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव, आंतरिक अत्याचार और मुख्यधारा के विकास से प्रभावित होकर ‘सशस्त्र संघर्ष के विफल मार्ग’ को त्यागने के लिए मजबूर हो रहे हैं। एमएमसी जोन का पत्र इसी क्षेत्रीय दबाव और वैचारिक टूटन का परिणाम है, न कि शीर्ष केंद्रीय नेतृत्व का आधिकारिक आह्वान।

​निर्णायक मोड़ पर नक्सलवाद

​एमएमसी जोन का सामूहिक आत्मसमर्पण का प्रस्ताव एक भौगोलिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से निर्णायक मोड़ है। यह जोन महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती जंगलों को कवर करता है, जो लंबे समय से नक्सल आंदोलन का महत्वपूर्ण गलियारा रहा है। इस क्षेत्र के कैडरों का सामूहिक रूप से हथियार डालना, दंडकारण्य और बस्तर क्षेत्र में बचे हुए नक्सल आधार को और कमजोर करेगा।

​हाल ही में, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बताया है कि देश में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 2010 के 126 से घटकर 2025 में सिर्फ 11 रह गई है, जिसमें केवल तीन जिले (बीजापुर, सुकमा, और नारायणपुर) ‘सबसे अधिक प्रभावित’ बचे हैं। हिंसा की घटनाओं में 81% और संबंधित मौतों में 85% की भारी कमी आई है।

​यदि एमएमसी जोन का यह सामूहिक आत्मसमर्पण सफल होता है, तो यह मध्य भारत में नक्सलवाद को लगभग समाप्त कर देगा और सुरक्षाबलों को अपनी पूरी ताकत देश के शेष सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों—मुख्यतः छत्तीसगढ़ के दक्षिणी बस्तर—पर केंद्रित करने की अनुमति देगा।

​मुख्यमंत्रियों द्वारा इस पत्र का स्वागत किया गया है, लेकिन शर्तों पर किसी भी निर्णय को लेने से पहले केंद्र सरकार के साथ समन्वय किया जाएगा। सरकार के लिए यह एक संवेदनशील स्थिति है, जहां उन्हें शांति और आत्मसमर्पण को प्रोत्साहित करना है, लेकिन साथ ही सुरक्षा बलों की आक्रामकता को कम न करने का संदेश भी देना है। 15 फरवरी, 2026 तक की अवधि भारत में नक्सल विरोधी अभियान के इतिहास का एक महत्वपूर्ण और निर्णायक अध्याय साबित हो सकती है।

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