सनातन की शक्ति: राम का अपमान करने वालों को इसी जीवन में मिली सजा? लालू-राबड़ी परिवार में ‘जूतम पैजार’
परिचय
भारतीय राजनीति और समाज में आस्था, नैतिकता और कर्मफल का सिद्धांत गहरा स्थान रखता है। एक पुरानी सनातन मान्यता है कि जो व्यक्ति भगवान राम का अपमान करता है, उसे इसी जीवन में अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ता है। यह मान्यता बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी के परिवार पर लागू होती दिख रही है। एक समय जो परिवार राजनीतिक शिखर पर था और जिसके घर में नौ बच्चों की रौनक थी, आज वह बिखराव और कलह के गहरे संकट से जूझ रहा है। इस लेख में हम उस घटनाक्रम का विश्लेषण करेंगे जिसने लालू-राबड़ी के घर को ‘जूतम पैजार’ का अखाड़ा बना दिया, और कैसे इस पारिवारिक त्रासदी को सनातन धर्म के प्रति उनके कथित अनादर से जोड़कर देखा जा रहा है।
🚩 राम-रथ को रोकने वाले और आस्था का अनादर
लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक जीवन अक्सर विवादास्पद रहा है। बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर, उन्होंने सार्वजनिक मंचों से भगवान राम और हिंदू आस्था के प्रतीकों को लेकर कई ऐसे बयान दिए, जिन्हें करोड़ों हिंदुओं ने अपमानजनक माना। इनमें सबसे चर्चित घटना 1990 में हुई जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी द्वारा निकाली जा रही ‘राम रथ यात्रा’ को बिहार में रोक दिया। यह एक राजनीतिक कदम था, लेकिन इसे व्यापक रूप से राम और उनकी आस्था के प्रति अनादर के रूप में देखा गया।
लालू और राबड़ी दोनों ने अपने शासनकाल में कभी भी सार्वजनिक रूप से राम के प्रति श्रद्धा या सम्मान प्रकट नहीं किया। जब भी अवसर मिला, उन्होंने या तो तटस्थता बरती या विरोध का रास्ता चुना। सनातन संस्कृति के अनुयायियों का मानना है कि इस तरह के ‘अधर्म’ का परिणाम अंततः व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में भुगतना पड़ता है—एक ऐसा सिद्धांत जो अब लालू-राबड़ी परिवार में हो रही उथल-पुथल से जोड़ा जा रहा है।
💔 ‘जूतम पैजार’: जब किडनी का बलिदान भी रिश्तों को न बचा सका
लालू-राबड़ी परिवार में कुल नौ संतानें हैं—सात बेटियाँ और दो बेटे। इस बड़े परिवार में सबसे मार्मिक और हालिया घटना बेटी रोहिणी आचार्य और बेटे तेजस्वी यादव के बीच हुई ‘जूतम पैजार’ की है। यह घटना सिर्फ एक पारिवारिक झगड़ा नहीं है, बल्कि एक ऐसे परिवार के आंतरिक पतन का प्रतीक है जिसने सार्वजनिक जीवन में ऊँचाईयाँ हासिल कीं।
यह सर्वविदित है कि लालू प्रसाद यादव अपनी गंभीर किडनी की बीमारी से जूझ रहे थे। उनकी जान बचाने के लिए, उनकी बेटी रोहिणी आचार्य ने असाधारण त्याग करते हुए उन्हें अपनी एक किडनी दान की। लालू प्रसाद यादव आज जो जीवन जी रहे हैं, वह रोहिणी के इस बलिदान का ही परिणाम है। यह कृत्य किसी भी परिवार में अटूट प्रेम और त्याग का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है।
लेकिन, 15 नवंबर को पटना स्थित सरकारी आवास पर जो हुआ, उसने इस त्याग की पवित्रता पर भी सवाल उठा दिया। रोहिणी आचार्य ने अपने छोटे भाई तेजस्वी यादव पर बदसलूकी, गाली-गलौज और चप्पल से मारने के प्रयास का गंभीर आरोप लगाया।
🔥 तेजस्वी का विवादित आरोप: ‘किडनी बेची’
रोहिणी के अनुसार, विवाद के दौरान तेजस्वी यादव ने एक अत्यंत ही असंवेदनशील और अपमानजनक आरोप लगाया। तेजस्वी ने कहा कि रोहिणी ने पिता को किडनी ‘बेची’ है। उन्होंने आरोप लगाया कि रोहिणी ने इसके बदले में “करोड़ों रुपया” और आगामी लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का टिकट लिया है।
यह आरोप न केवल रोहिणी के त्याग को अपमानित करता है, बल्कि उस पारिवारिक बंधन को भी तार-तार करता है जो एक जीवनरक्षक दान पर टिका हुआ था। रोहिणी और तेजस्वी के बीच यह हिंसक कलह लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की उपस्थिति में हुआ।
रोहिणी आचार्य का हृदय विदारक बयान है कि जब वह घर से निकल रही थीं, तो लालू और राबड़ी की आँखों में आँसू थे, लेकिन वे दोनों अपने बेटे तेजस्वी की “दबंगता के आगे बेबस” थे। उनका यह बयान एक ऐसे पिता की लाचारी को दर्शाता है जो अपनी जान बचाने वाली बेटी के अपमान को रोक नहीं पाया और एक ऐसी माँ की व्यथा को, जो अपने ही बच्चों के बीच की दुश्मनी में पंगु हो गई।
🏠 परिवार का बिखराव: 9 बच्चों का घर हुआ खाली
रोहिणी आचार्य की आपबीती यहीं खत्म नहीं होती। उन्होंने दावा किया कि उन्हें ही नहीं, बल्कि उनकी छोटी बहनों—राजलक्ष्मी, रागिनी और चंदा—को भी पटना वाले घर से बाहर निकाल दिया गया है। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि सत्ता और राजनीतिक विरासत के संघर्ष ने इस परिवार को भीतर से कितना खोखला कर दिया है।
बड़ी बहन मीसा भारती, जो स्वयं राज्यसभा सांसद हैं, पहले ही पटना वाला घर छोड़ चुकी थीं।
बड़े भाई तेज प्रताप यादव, जो अक्सर अपने बयानों और हरकतों को लेकर चर्चा में रहते हैं, उन्हें भी पहले ही घर से निकाला जा चुका है या उन्होंने स्वयं अलगाव कर लिया है।
रोहिणी आचार्य और तीन अन्य बहनें अब घर से बेदखल हैं।
इस तरह, लालू-राबड़ी की नौ संतानों वाला भरा-पूरा परिवार आज पूरी तरह से बिखर चुका है। सत्ता की राजनीति ने उन्हें एक-दूसरे से दूर कर दिया है, और कथित तौर पर तेजस्वी यादव ही अब परिवार के भीतर ‘शक्ति का केंद्र’ बन गए हैं, जो अपने निर्णय बलपूर्वक लागू कर रहे हैं।
🎯 कर्मफल और राजनीतिक विफलता का गठजोड़
लालू-राबड़ी परिवार में हो रही इस ‘जूतम पैजार’ और बिखराव को कई लोग सनातन मान्यता के ‘कर्मफल सिद्धांत’ से जोड़ रहे हैं। यह सिद्धांत कहता है कि व्यक्ति जो बोता है, वही काटता है। जो लोग भगवान राम और धार्मिक आस्था का अपमान करते हैं, उन्हें अपने जीवन में सुख-शांति नहीं मिलती।
इस पारिवारिक उथल-पुथल के साथ-साथ, लालू की पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल (राजद), को हाल ही के विधानसभा चुनाव में भी बुरी हार का सामना करना पड़ा है। यह दोहरी विफलता—एक निजी जीवन में और दूसरी राजनीतिक करियर में—को लोग एक ही सिक्के के दो पहलू मान रहे हैं।
राजनीति में सत्ता और विरासत के लिए संघर्ष नया नहीं है, लेकिन जिस तरह से एक बेटी के जीवनरक्षक त्याग को ‘सौदेबाजी’ बताकर अपमानित किया गया है, वह भारतीय राजनीतिक संस्कृति के निम्नतम स्तर को दर्शाता है। यह घटना सिर्फ लालू-राबड़ी परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन सभी को एक सबक है जो धर्म और आस्था को तुच्छ मानकर सत्ता की राह पर चलते हैं।
लालू-राबड़ी परिवार में मचा घमासान—’जूतम पैजार’ और नौ बच्चों का घर छोड़कर जाना—एक गहरी त्रासदी है। यह दिखाता है कि राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ और सत्ता की पकड़ किस तरह पारिवारिक मूल्यों और रिश्तों को नष्ट कर सकती है। सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार, यदि किसी ने ‘राम का अपमान’ किया है, तो उसे इसी जीवन में कष्ट भोगना पड़ेगा। लालू और राबड़ी के सामने उनके बच्चों के बीच हो रहा यह कलह, उनकी बेबसी और परिवार का बिखराव, इस मान्यता की सत्यता पर बल देता प्रतीत होता है। यह परिवार आज सत्ता की ऊँचाई से रिश्तेदारी और नैतिक पतन की खाई में गिरता दिख रहा है, जहाँ किडनी का त्याग भी अपमान का कारण बन गया है।



