150 साल बाद फिर गूंजा वंदे मातरम्” – चिकित्सा संस्थानों में उमड़ा देशभक्ति का जज़्बा, लिया आत्मनिर्भर भारत का संकल्प
वंदे मातरम् की गूंज से चिकित्सा संस्थान हुए देशभक्ति से ओतप्रोत 🇮🇳
राष्ट्रगीत के 150 वर्ष पूर्ण — स्वास्थ्य कर्मियों ने लिया आत्मनिर्भर भारत का संकल्प
भीलवाड़ा, 07 नवम्बर।
देश की मिट्टी से जुड़ी भावना, राष्ट्रप्रेम का प्रतीक और आज़ादी के आंदोलन की आत्मा — “वंदे मातरम्” ने आज फिर एक बार पूरे देश को एक सूत्र में बाँध दिया। राष्ट्रगीत के 150 वर्ष पूर्ण होने के इस ऐतिहासिक अवसर पर भीलवाड़ा जिले के सभी चिकित्सा संस्थानों, सरकारी अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों और निजी क्लीनिकों में “वंदे मातरम्” की गूंज गूँज उठी। वातावरण में भक्ति, गर्व और देशप्रेम का अनूठा संगम देखने को मिला।
🌿 राष्ट्रगीत के 150 वर्ष: इतिहास से वर्तमान तक
1870 के दशक में बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित “वंदे मातरम्” केवल एक गीत नहीं था, बल्कि यह भारत की आत्मा की आवाज़ थी। इस गीत ने स्वाधीनता संग्राम के दौरान अनगिनत क्रांतिकारियों को जोश और प्रेरणा दी। 1905 के बंग-भंग आंदोलन से लेकर 1947 की आज़ादी तक यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों के दिलों की धड़कन बना रहा। आज जब यह गीत 150 वर्ष पूरे कर चुका है, तो इसका उत्सव केवल अतीत की याद नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक नये संकल्प का प्रतीक बन गया है।
🏥 चिकित्सा संस्थानों में हुआ विशेष आयोजन
भीलवाड़ा जिले के प्रत्येक सरकारी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और उप-स्वास्थ्य केन्द्रों में शुक्रवार सुबह राष्ट्रगीत कार्यक्रम का आयोजन किया गया। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों, डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और चिकित्सा कर्मियों ने एक साथ खड़े होकर राष्ट्रगीत गाया।
जिले के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी (CMHO) डॉ. [नाम] ने अपने संबोधन में कहा —
> “‘वंदे मातरम्’ केवल शब्द नहीं, यह हमारे कर्म और सेवा का प्रतीक है। जब हम ‘मां भारती की जय’ कहते हैं, तो उसके साथ यह संकल्प भी जोड़ते हैं कि देश के हर नागरिक के स्वास्थ्य, सम्मान और आत्मनिर्भरता के लिए कार्य करेंगे।”
🌸 आत्मनिर्भर भारत का संकल्प
इस अवसर पर सभी चिकित्सा संस्थानों में “आत्मनिर्भर भारत” थीम पर शपथ दिलाई गई। स्वास्थ्यकर्मियों ने यह वचन लिया कि वे अपने कार्यक्षेत्र में भारतीय तकनीक, स्वदेशी दवाओं और मेड-इन-इंडिया स्वास्थ्य उपकरणों को प्राथमिकता देंगे।
कार्यक्रम में यह भी संकल्प लिया गया कि —
चिकित्सा सेवाओं में पारदर्शिता और मानवीयता को सर्वोच्च रखा जाएगा।
गांव-गांव में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाने का प्रयास जारी रहेगा।
भारतीय अनुसंधान, योग, आयुर्वेद और स्वदेशी चिकित्सा पद्धतियों को प्रोत्साहन दिया जाएगा।
🎶 वंदे मातरम् की गूंज से उमड़ा देशभक्ति का माहौल
जैसे ही राष्ट्रगीत की धुन बजाई गई, सभी उपस्थितजन एक स्वर में “वंदे मातरम्” गाने लगे। अस्पतालों के गलियारों, ब्लड बैंक, वार्ड्स और ओपीडी क्षेत्रों में यह गीत गूंजने लगा तो वातावरण भावनाओं से भर गया। कई मरीजों और उनके परिजनों ने भी कार्यक्रम में भाग लेकर भारत माता को नमन किया।
मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल ने बताया —
> “आज का दिन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि यह वह क्षण है जब हम अपने कर्मक्षेत्र को देशसेवा से जोड़ते हैं। चिकित्सा का कार्य केवल उपचार नहीं, बल्कि यह राष्ट्र की सेवा का सबसे बड़ा माध्यम है।”
💉 स्वास्थ्य सेवा और राष्ट्रसेवा का संगम
कार्यक्रम के तहत कई स्थानों पर रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य जांच शिविर और आयुष जागरूकता अभियान भी आयोजित किए गए। युवाओं ने “स्वस्थ भारत – सशक्त भारत” के नारे लगाए।
आयुष विभाग द्वारा आयोजित सत्र में यह बताया गया कि कैसे योग और प्राकृतिक चिकित्सा भारत की पारंपरिक धरोहर हैं और आत्मनिर्भर भारत की स्वास्थ्य दृष्टि में इनकी भूमिका अहम है।
🌺 महिला चिकित्सा कर्मियों की विशेष भूमिका
महिला डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और स्वास्थ्य सहायिकाओं ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत के शब्द उन्हें यह प्रेरणा देते हैं कि “मां” की सेवा केवल घर में नहीं, बल्कि देश की हर बेटी, हर मां और हर नागरिक तक पहुंचनी चाहिए।
एक नर्स ने कहा —
> “हम जब किसी मरीज को स्वस्थ करती हैं, तो हमें लगता है जैसे मां भारती के एक हिस्से को फिर से जीवित कर रही हैं।”
🌞 प्रेरणादायक भाषण और सांस्कृतिक कार्यक्रम
कुछ चिकित्सा संस्थानों में विद्यार्थियों ने राष्ट्रगीत पर सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। बालिकाओं ने ‘वंदे मातरम्’ की स्वर लहरियों से सभागार को भक्ति और सम्मान के रंग में रंग दिया।
कई जगह डॉक्टरों ने राष्ट्रगीत के इतिहास पर व्याख्यान दिए, जिसमें बताया गया कि यह गीत अंग्रेजों के शासनकाल में कई बार प्रतिबंधित किया गया था, फिर भी भारतीयों ने इसे अपने दिल से कभी मिटने नहीं दिया।
🌾 राष्ट्रगीत से जुड़ा स्वास्थ्य संकल्प
कार्यक्रम के समापन पर सभी उपस्थितजनों ने राष्ट्रगीत के प्रति श्रद्धांजलि देते हुए यह वचन लिया कि वे न केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ रहेंगे, बल्कि समाज को भी स्वस्थ बनाने का प्रयास करेंगे।
सभी ने कहा कि “स्वस्थ नागरिक ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं” — और यही वंदे मातरम् की सच्ची भावना है।
🌼 निष्कर्ष
150 वर्ष पूर्व रचित यह गीत आज भी उतना ही प्रासंगिक है। जिस तरह आज़ादी के आंदोलन में इसने देश को एकजुट किया, उसी तरह आज यह गीत स्वास्थ्य, एकता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनकर उभर रहा है। भीलवाड़ा के चिकित्सा संस्थानों में गूंजता “वंदे मातरम्” इस बात का प्रमाण है कि भारत आज भी अपने संस्कारों, अपनी जड़ों और अपने राष्ट्रगौरव से गहराई से जुड़ा है।
“वंदे मातरम्” केवल राष्ट्रगीत नहीं, बल्कि वह भावना है जो हर भारतीय को यह याद दिलाती है —
हम सब मां भारती के सपूत हैं, और उसकी सेवा ही हमारा सर्वोच्च धर्म है। 🇮🇳



