संवाददाता अवधेश प्रताप सिंह
देश की राजनीति में इस समय तमिलनाडु के एक मंदिर-दरगाह विवाद ने भूचाल ला दिया है, जिसके केंद्र में अब समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी आ गए हैं। इस पूरे प्रकरण को कई राजनीतिक पर्यवेक्षक दक्षिण भारत का ‘अयोध्या मोमेंट’ बता रहे हैं, जिसका सीधा चुनावी लाभ ‘मन्दिरवादी पार्टी’ (भाजपा) को मिलना तय माना जा रहा है।

जज को हटाने मुहिम और विपक्ष का साथ विवाद तमिलनाडु के एक प्राचीन मंदिर से जुड़ा है, जहाँ कार्तिक मास में एक स्तंभ पर दीपक प्रज्ज्वलित करने की सदियों पुरानी प्रथा है।यह स्तंभ पास की एक दरगाह से लगभग 164 फीट दूर स्थित है।दरगाह पक्ष द्वारा विरोध किए जाने पर यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जिसने ऐतिहासिक परंपरा को बरकरार रखते हुए मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया। सूत्रों के अनुसार, तमिलनाडु की सत्तारूढ़ डीएमके सरकार ने न केवल हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की, बल्कि फैसला सुनाने वाले जज को पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाने का अभूतपूर्व और अत्यंत विवादास्पद फैसला किया है। इस प्रस्ताव पर 100 से अधिक सांसदों के हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं, जिनमें कांग्रेस और सपा के सांसद भी शामिल हैं। सबसे चौंकाने वाला दृश्य तब सामने आया जब प्रस्ताव सौंपते समय अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी डीएमके नेता कनिमोझी के साथ अगली कतार में खड़े दिखाई दिए। ’एंटी-हिन्दू नैरेटिव’ पर मोहर? राजनीतिक विश्लेषक इस घटना को भारतीय राजनीति के लिए एक खतरनाक मोड़ बता रहे हैं।

डीएमके की राजनीति, जिसे आलोचक ‘ब्रिटिश-कालीन एंटी-हिन्दू पॉलिटिक्स’ का विस्तार मानते हैं, का स्टैंड तो समझा जा सकता है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर के विपक्षी नेताओं का एक जज को ‘मंदिर के पक्ष में फैसला’ देने के लिए महाभियोग लाने की पहल का समर्थन करना, उनकी राजनीतिक चेतना पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।पत्रकार अवधेश प्रताप सिंह ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “क्या अखिलेश जी और प्रियंका जी भी यह मान चुके हैं कि जजों को मन्दिर के पक्ष में फैसला देने पर संसद में #इमपीच किया जाएगा? यह तस्वीर उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में हर घर पहुंचाई जाएगी।” पश्चिम बंगाल और चुनावी समीकरण इस बीच, पश्चिम बंगाल में भी धार्मिक समीकरण गर्माए हुए हैं। ममता बनर्जी की पार्टी के मंत्री हुमायूँ कबीर द्वारा ‘बाबरी बनाने’ की घोषणा के बाद उन्हें पार्टी से निकालने की कोशिश की गई, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह मामला इतनी आसानी से दबने वाला नहीं है। भारत का स्वघोषित ‘लिबरल और प्रोग्रेसिव तबका’, जो अक्सर ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर मुखर रहता है, इस समय चुप्पी साधे हुए है, जिसने विपक्ष की दुविधा को और गहरा दिया है। उत्तर भारत में सीधा नुकसान तय विश्लेषकों का मानना है कि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के इन संवेदनशील घटनाक्रमों का सीधा और बड़ा लाभ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिलेगा: उत्तर प्रदेश (यूपी): अखिलेश यादव की यह तस्वीर (डीएमके के समर्थन में) यूपी के कोर वोट बैंक के बीच तुष्टिकरण की राजनीति के नैरेटिव को और मजबूत करेगी। पश्चिम बंगाल: भाजपा पहले ही राज्य में मुख्य विपक्षी दल है और ये मुद्दे सत्ता तक पहुंचने के लिए उसके हिंदुत्व एजेंडे को धार देंगे। तमिलनाडु: लोकसभा चुनाव में भाजपा वोट शेयर के हिसाब से तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है, और ऐसे ‘ध्रुवीकरण के क्षण’ उसे राज्य में अपनी जड़ें मजबूत करने का मौका देंगे। यह वक्त बताएगा कि ये नए संवेदनशील मुद्दे संबंधित राज्यों की राजनीति पर क्या असर डालते हैं, लेकिन अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश सहित पूरे उत्तर भारत में इस विवादास्पद तस्वीर के कारण होने वाले राजनीतिक नुकसान के लिए तैयार रहना होगा।



